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सुदामा के पांव का कांटा हाथ से निकालने लगे, हाथ से कांटा नहीं निकला तो भगवान ने अपने मुख से कांटा निकाला:डा रमनीक कृष्ण जी महाराज

एमडब्ल्यूबी न्यूज़,चंडीगढ़ । श्रीमदभागवत कथा के विश्राम दिवस में सद्भावना दूत भागवताचार्य डा रमनीक कृष्ण जी महाराज ने सुदामा का मार्मिक चरित्र श्रवण कराते हुए बताया के संदीपनी ऋषि के आश्रम में पहले दिन सुदामा जी पैदल जा रहे थे। नंगे पांव सुदामा जी चल रहे थे पांव में शूल चुभी। सुदामा कराह उठे, पीछे से भगवान श्रीकृष्ण रथ में गुरुकुल शिक्षा के लिए पहले ही दिन आ रहे थे। सुदामा को क्रंदन करते देख रथ से उतरे। सुदामा के पांव का कांटा हाथ से निकालने लगे। हाथ से कांटा नहीं निकला तो भगवान ने अपने मुख से कांटा निकाला। मित्र हमारे आज भी दुनिया में अनेक है पर कोई श्रीकृष्ण जैसा मित्र जीवन में मिल जाए तो किसका कल्याण ना हो जाए। दोनो गुरुकुल पहुंचे। शिक्षा ग्रहण की।

इसी गुरुकुल के पास एक बुढ़िया मैया रहा करती थी। जो प्रभु का बड़ा भजन करती थी। उसके पास खाने के लिए केवल चने होते थे। एक दिन रात को एक चोर आया वो माता के चने चुरा कर ले गया। माता बड़ी व्याकुल हुई और शाप दे दिया जो भी मेरे हिस्से के चने खायेगा, वो जन्म जन्मांतर का दरिद्र हो जायेगा। चोर के पीछे कुछ लोग भागे, चोर को लगा मैं कोई कीमती वस्तु चुरा लाया हु, तो उसने घबराकर वो पोटली ऋषि के आश्रम में डाल दी। प्रातः काल आज वन से लकड़ियां लाने की सेवा कृष्ण और सुदामा की लगी। गुरु मां ने वो ही पोटली उठाकर सुदामा को दे दी। सुदामा कोई साधारण ब्राह्मण नहीं थे, पोटली देखते ही उसके ऊपर की दरिद्रता सुदामा ने पड़ ली।

विचार करने लगे के अगर इन चनो को भगवान खायेंगे तो शाप तो भगवान को भी स्वीकार करना पड़ा। अगर भगवान दृद्रि हो गए तो संसार का क्या होगा। अगर मैं ये चने धरती में गाड़ देता हूं। फिर सोचा धरती के जीव जंतु ना जाने कितने जन्मों की दृद्रता भोग रहे, ये चने अगर उनके मुख में पड़े तो उनकी की क्या दशा होगी। फिर सोचा ये चने मैं जल में डाल देता हूं, मन में विचार आया के धरती के जीव जंतु अगर इनको खायेंगे तो जन्म जन्मांतर के दरिद्र हो जायेंगे। फिर मन में विचार किया के क्यों न ये चने खाकर पूरी दुनिया की दरिद्रता मैं अपने ऊपर ही ले लेता हूं। सुदामा ने एक मुट्ठी चावल मुख में डाली तो धरती की दरिद्रता ले ली, दूसरी मुट्ठी चावल खाई तो अंबर की दरिद्रता अपने ऊपर ले ली। तीसरी मुट्ठी खाई तो पाताल की दरिद्रता अपने ऊपर ले ली।

लोग कहते हैं सुदामा ने कृष्ण के हिस्से के चने खाए इसलिए दरिद्री हुए, पर किसे पता था सुदामा ने पूरी दुनिया की दरिद्रता अपने ऊपर लेकर संसार पर कितना बड़ा उपकार किया। फिर जब सुदामा श्रीकृष्ण का दर्शन करने के लिए जब द्वारिका गए तो तीन मुट्ठी चावल छुपा कर ले गए। भगवान ने व्यंग किया सुदामा तुम्हारी छुपाने की आदत अभी तक नहीं गई, ओर भगवान ने कांख से छीन कर पहली मुट्ठी चावल खाये तो सुदामा के चनो को याद किया और सुदामा को अंबर का राज्य प्रदान कर दिया। दूसरी मुट्ठी खाई तो धरती का सम्राज्य सुदामा को प्रदान कर दिया। तीसरी मुट्ठी जब खाने लगे तो रानियों ने हाथ पकड़ लिया

प्रभु क्या सब कुछ दे दोगे? भगवान ने कहा अपने भक्त के लिए मैं लुट जाऊं, मीट जाऊं यही मेरा स्वभाव है। मैं भक्तन को दास, भक्त मेरे शिशमणि।। अपने भक्तों के लिए मैं अपनी प्रतिज्ञा भी भूल जाता हूं।। आज कथा में विशेष रूप से शशि शंकर तिवारी भारतीय जनता पार्टी के नेता, ब्रह्मकुमारी पूनम दीदी, समाज सेवी विजय उपस्थित रहे । सभा ने सबका स्वागत किया। कथा के पश्चात सभा की ओर से भंडारे का आयोजन किया गया।

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